भारत में शिक्षा सदियों से “जीवन जीने की कला” और “समाज के कल्याण” के लिए होती थी। गुरुकुलों में पढ़ाई केवल अक्षरज्ञान तक सीमित नहीं थी, बल्कि जीवन कौशल, नैतिकता,
भारत में शिक्षा सदियों से “जीवन जीने की कला” और “समाज के कल्याण” के लिए होती थी। गुरुकुलों में पढ़ाई केवल अक्षरज्ञान तक सीमित नहीं थी, बल्कि जीवन कौशल, नैतिकता,
आयुर्वेद के अनुसार सम्पूर्ण स्वास्थ्य का आधार त्रिदोष – वात, पित्त, और कफ – के संतुलन में निहित है। चरक संहिता (सूत्रस्थान 1/57) में कहा गया है: “वायु: पित्तं कफश्चैव
संसार की सबसे रहस्यमयी अवधारणाओं में से एक है – माया। यह शब्द हर धार्मिक, दार्शनिक और आत्मबोध के मार्ग में सामने आता है। माया का अर्थ क्या है?क्या यह
यदि ईश्वर करुणामय है तो सृष्टि में इतना दुःख क्यों है? यह प्रश्न केवल आधुनिक चिंतन नहीं, अपितु ऋषियों, मुनियों, तत्त्वचिंतकों, और महान दार्शनिकों के मन में भी उत्पन्न हुआ
आज के युग में तनाव (Stress), चिंता (Anxiety) और डिप्रेशन (Depression) जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं। नौकरी का दबाव, रिश्तों में असंतुलन, भविष्य की अनिश्चितता और सामाजिक अपेक्षाएं
भारतीय वैदिक परंपरा में ज्ञान, तप और साधना के आधार पर ऋषियों को अलग-अलग श्रेणियों में बाँटा गया है। जब हम वेद, उपनिषद, दर्शन या महाकाव्य पढ़ते हैं तो अनेक
भारतीय ऋषियों ने जीवन को स्वस्थ और संतुलित बनाए रखने के लिए दिनचर्या (Daily Routine) और रात्रिचर्या (Night Routine) दोनों पर विशेष जोर दिया। जैसे दिन की अच्छी शुरुआत ऊर्जा
आज के आधुनिक युग में मनुष्य ने विज्ञान और तकनीक के माध्यम से अद्भुत प्रगति की है — लेकिन क्या सच में उसने शांति पाई है? जिस तेज गति से
भारतीय अध्यात्म में एक प्रश्न सदा से लोगों को उलझाता रहा है — “लोक” का अर्थ क्या है? क्या भूलोक, स्वर्लोक, महर्लोक जैसे लोक कोई आकाशीय ग्रह हैं? या ये
भारतवर्ष की पहचान सदैव उसके ज्ञान और संस्कृति से रही है। इस पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखने में गुरु-शिष्य परंपरा का सबसे बड़ा योगदान है। सनातन धर्म में ज्ञान केवल







Arvind Mukherjee: Excellent analysis
Arvind Mukherjee: Extremely good and well analysed write up
Arvind Mukherjee: Good clarification
Amit vyas: आपके कार्य को नमन गुरुजी🙏