आयुर्वेद, भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति, केवल रोगों के उपचार की विधि ही नहीं बल्कि जीवन जीने की कला है। इसमें मनुष्य को शरीर (शरीर-शास्त्र), मन (मनोविज्ञान), आत्मा (आध्यात्मिकता) और
आयुर्वेद, भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति, केवल रोगों के उपचार की विधि ही नहीं बल्कि जीवन जीने की कला है। इसमें मनुष्य को शरीर (शरीर-शास्त्र), मन (मनोविज्ञान), आत्मा (आध्यात्मिकता) और
ग्रहण (Eclipse) शब्द सुनते ही रहस्य, उत्सुकता और अनेक मान्यताएँ हमारे मन में उमड़ने लगती हैं। भारतीय परंपरा में ग्रहण को केवल खगोलीय घटना ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक
संतान उत्पत्ति केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह धर्म, समाज और भविष्य की आधारशिला है। वैदिक शास्त्र कहते हैं कि संतान का जन्म संस्कार और धर्म परंपरा को
मनुष्य कर्मशील है। कर्म करते हुए वह या तो धर्मपथ पर चलता है या अधर्म की ओर भटक जाता है। जब अधर्मजन्य कर्म होता है तो उसे शास्त्रों में पाप
भारतीय संस्कृति का मूल तत्व संस्कार हैं। संस्कार जीवन के वे सोपान हैं जो जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के हर चरण को शुद्ध, संतुलित और अर्थपूर्ण बनाते हैं।
भारतीय समाज में “शूद्र” शब्द को लेकर सबसे अधिक भ्रांतियाँ फैली हुई हैं। आम जनमानस में यह धारणा बना दी गई है कि शूद्र का अर्थ “नीच जाति” या “दास”
भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में “देवता” शब्द का अत्यंत गहरा और वैज्ञानिक महत्व है। प्रायः लोगों के मन में यह प्रश्न आता है कि “क्या वास्तव में सनातन धर्म
मानव जीवन कर्मप्रधान है। प्रत्येक क्षण हम कर्म करते हैं—चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो या वाचिक। वेद, उपनिषद, गीता, मनुस्मृति और समस्त धर्मशास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि
वर्तमान हिन्दू समाज की सबसे लोकप्रिय धारणा में ब्रह्मा, विष्णु और शिव को सृष्टि के तीन अलग-अलग देवता माना जाता है — ब्रह्मा को सृष्टिकर्ता, विष्णु को पालनकर्ता और शिव
जब हम “विज्ञान” शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में आधुनिक लैब्स, रोबोट्स, स्पेस टेक्नोलॉजी, और इलेक्ट्रॉनिक्स का चित्र उभरता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि विज्ञान की







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Amit vyas: आपके कार्य को नमन गुरुजी🙏