
मनुष्य की उत्पत्ति का प्रश्न केवल आधुनिक विज्ञान का नहीं है। यह प्रश्न वेदों, उपनिषदों और भारतीय दर्शनों में अत्यंत गंभीरता से उठाया गया है। आज प्रचलित विकासवाद (Evolution Theory) यह मानता है कि मनुष्य आदिम अवस्था से धीरे-धीरे विकसित हुआ, जबकि वैदिक विचारधारा इसके ठीक विपरीत यह कहती है कि—
सृष्टि के आरंभ में मनुष्य अधिक ज्ञानी था और समय के साथ ज्ञान का ह्रास हुआ।
इस ब्लॉग पोस्ट में हम भावनात्मक व्याख्या नहीं, बल्कि स्पष्ट श्लोक, मंत्र संख्या और क्रमबद्ध तर्क के साथ यह समझेंगे कि वैदिक सिद्धांत के अनुसार मनुष्य का अवतरण कैसे हुआ।
यह एक सामान्य भ्रांति है कि वेद सृष्टि को अचानक उत्पन्न मानते हैं।
वास्तव में वेद सृष्टि को क्रमिक (Gradual Manifestation) बताते हैं।
ऋग्वेद
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम् ।
नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ॥
(ऋग्वेद 10.129.1 – नासदीय सूक्त)
स्पष्ट अर्थ
सृष्टि के प्रारंभ में न स्थूल सत था, न असत।
अर्थात सृष्टि एक अव्यक्त अवस्था में थी।
निष्कर्ष
वेद सृष्टि को अराजक या आकस्मिक नहीं, बल्कि नियमानुसार प्रकट होने वाली प्रक्रिया मानते हैं।
वेद और उपनिषद स्पष्ट रूप से कहते हैं कि संपूर्ण भौतिक सृष्टि — और मनुष्य का शरीर —
पंचमहाभूतों से बना है:
तैत्तिरीयोपनिषद
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः।
आकाशाद्वायु। वायोरग्निः।
अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी।
(तैत्तिरीयोपनिषद 2.1.1 – ब्रह्मानन्दवल्ली)
यहाँ यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सृष्टि का मूल आत्मतत्त्व है, केवल जड़ पदार्थ नहीं।
यह प्रश्न आधुनिक विज्ञान और वैदिक दर्शन — दोनों के लिए केंद्रीय है।
ऋग्वेद
ओषधयः सोमराज्ञीः पूर्वा जाता उताहम्
(ऋग्वेद 10.97.1)
अर्थात—
वनस्पतियाँ प्राणियों से पहले उत्पन्न हुईं।
यजुर्वेद
पृथिव्या ओषधयः सम्भूताः
(यजुर्वेद 12.63)
निष्कर्ष
वेद भी वही कहते हैं जो आधुनिक जीवविज्ञान कहता है—
पहले वनस्पति जीवन, फिर प्राणी जीवन।

अब मनुष्य के अवतरण का सबसे स्पष्ट क्रम देखें।
पृथिव्या ओषधयः।
ओषधिभ्योऽन्नम्।
अन्नाद्रेतः।
रेतसः पुरुषः॥
(तैत्तिरीयोपनिषद 2.1.1)
| क्रम | वैदिक शब्द | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | ओषधि | वनस्पति |
| 2 | अन्न | पोषण |
| 3 | रेत | जैविक शक्ति |
| 4 | पुरुष | चेतन मनुष्य |
यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य सीधे मिट्टी से नहीं, बल्कि पोषण और जैव-ऊर्जा के क्रम से उत्पन्न होता है।
उत्तर: नहीं।
वेदों और दर्शनों के अनुसार प्रारंभिक सृष्टि अमैथुनी थी।
वायुना वीर्यरजसोः कणयोगेन प्राणिनाम्।
उत्पद्यन्ते शरीराणि वल्मीकैरावृतानि च॥
भावार्थ
वायु के माध्यम से सूक्ष्म कणों का संयोग हुआ,
जिससे शरीर बना और उसके चारों ओर मिट्टी जैसा आवरण रहा।
परिपक्व अवस्था में वह आवरण टूट गया।
इसी को आदि अमैथुनी सृष्टि कहा गया है।
वैशेषिक दर्शन
अयोनिजमनपेक्षितं शुक्रशोणितं
देवर्षीणां शरीरं जायते।
अर्थात— प्रथम देव और ऋषियों के शरीर स्त्री-पुरुष संयोग के बिना उत्पन्न हुए।
यह कथन अमैथुनी सृष्टि को दार्शनिक आधार प्रदान करता है।
यजुर्वेद
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये
(यजुर्वेद 31.9)
यहाँ तेन का अर्थ है—
उस परम पुरुष (ईश्वर) द्वारा।
अर्थ – आदि में ईश्वर ने ही पुरुष, स्त्री, ऋषि और देवों की रचना की।
इसके बाद ही मैथुनी सृष्टि आरंभ हुई।
वेदों का उत्तर बिल्कुल स्पष्ट है— नहीं।
ऋग्वेद
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्
(ऋग्वेद 10.90.1)
मनुष्य को यहाँ ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक बताया गया है, न कि एक जंगली प्राणी।
वैदिक परंपरा के अनुसार सृष्टि का आरंभ सत्ययुग में हुआ।
उस समय मनुष्य धर्म, ज्ञान और संयम से युक्त था।
समय के साथ—
यह दृष्टि आधुनिक “Primitive Man Theory” से मूलतः भिन्न है।
वैदिक सिद्धांत के अनुसार मनुष्य का अवतरण—
✔ क्रमिक है, आकस्मिक नहीं
✔ वनस्पति-आधारित है
✔ प्रारंभ में अमैथुनी है
✔ आत्मा-प्रधान है, केवल शरीर नहीं
✔ ज्ञान से पतन की कथा है, अज्ञान से विकास की नहीं
वेद मनुष्य को संयोग की नहीं, संकल्प की सृष्टि मानते हैं।







