
भारतीय समाज में “संक्रांति” शब्द को प्रायः एक धार्मिक पर्व या फलित-ज्योतिषीय घटना के रूप में समझ लिया गया है। विशेष रूप से मकर संक्रांति को लेकर यह धारणा बना दी गई है कि सूर्य किसी “मकर नामक राशि” में प्रवेश करता है और उसी कारण यह दिन पवित्र या शुभ हो जाता है।
यह लेख आचार्य दीपक द्वारा इसी मूलभूत भ्रांति को तथ्य, शास्त्र और विज्ञान के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास है।
संक्रांति न तो पूजा का विषय है, न ही कोई अलौकिक घटना। यह काल-गति (Time Dynamics) और सूर्य की दिशात्मक गति से संबंधित एक वैज्ञानिक-सिद्धांत है, जिसे वैदिक ऋषियों ने अत्यंत सूक्ष्मता से समझा था।
संक्रांति = सम् + क्रान्ति
अर्थात — एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाना।
वैदिक परंपरा में संक्रांति का अर्थ है:
सूर्य की गति में होने वाला दिशात्मक परिवर्तन।
यह परिवर्तन:
बल्कि यह प्राकृतिक खगोलीय घटना है।
| विवरण | तिथि |
|---|---|
| ग्रेगोरियन कैलेंडर | 21–22 दिसंबर |
| विक्रम संवत (लगभग) | पौष कृष्ण / शुक्ल पक्ष |
| नक्षत्रीय स्थिति | सूर्य की दक्षिणतम स्थिति |
| वैदिक नाम | उत्तरायण आरंभ |
📌 यहाँ कोई निश्चित “तिथि संख्या” नहीं दी जा सकती,
क्योंकि विक्रम संवत लूनी-सोलर (चंद्र-सौर) है।
👉 घटना सूर्य पर आधारित है,
जबकि तिथि चंद्रमा पर आधारित।
अब दूसरा स्तर समझिए।
📌 इसलिए पंचांग लिखता है:
“मकर संक्रांति — पौष मास, शुक्ल पक्ष”
लेकिन यह लेबलिंग है, घटना नहीं।
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है।
वेदों में बार-बार उल्लेख मिलता है:
अर्थात — वेदों का फोकस राशि नहीं, गति (Motion) है।
वेदांग ज्योतिष का उद्देश्य स्पष्ट है:
यज्ञ, ऋतु, काल और खगोलीय घटनाओं का शुद्ध निर्धारण।
वेदांग ज्योतिष में:
मिलती है, राशि आधारित नहीं।
यहाँ संक्रांति का अर्थ है:
जब सूर्य की गति दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर परिवर्तित होती है।
यह प्रश्न अत्यंत आवश्यक है।
12 राशियाँ वस्तुतः:
जैसे:
वैसे ही राशियाँ।
यह बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है।
👉 यह एक Coordinate System है, न कि कोई दैवी या प्राकृतिक सत्ता।
जब:
समझ लिया गया।
यहीं से फलित-ज्योतिष ने यह कहना शुरू किया:
“सूर्य मकर में है इसलिए शुभ है।”
जबकि वैदिक दृष्टि में सूर्य की दिशा शुभ या अशुभ नहीं होती, केवल अनुकूल या प्रतिकूल होती है।
अब मूल प्रश्न:
“यदि राशि वैदिक नहीं है, तो मकर संक्रांति क्यों?”
उत्तर स्पष्ट है:
“मकर” केवल एक नामकरण (Label) है, जिससे समाज उस खगोलीय बिंदु को पहचान सके जहाँ:
यही उत्तरायण है।
यह कोई धार्मिक कल्पना नहीं, बल्कि खगोलीय तथ्य है।
आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि:
पर प्रभाव डालता है।
उत्तरायण के बाद:
इसीलिए भारतीय परंपरा में यह कृषि और ऊर्जा-चक्र से जुड़ा है।
महाभारत का यह प्रसंग सबसे अधिक गलत समझा गया है।
“उत्तरायण में मरने से मोक्ष मिलता है।”
यह कथन:
भीष्म पितामह:
उत्तरायण उनके लिए:
काल कारण नहीं, सहायक परिस्थिति था। जब प्रकृति में ऊर्ध्वगामी प्रवाह हो,
तब साधक के लिए चेतना को ऊपर ले जाना सहज होता है।
उपनिषदों में वर्णित:
को यदि literal (शाब्दिक) न लेकर:
के रूप में समझा जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि:
मोक्ष का कारण काल नहीं, चित्त की अवस्था है।
यदि उत्तरायण में मरना ही मोक्ष देता, तो:
लेकिन ऐसा नहीं है।
अतः यह धारणा लोक-मान्यता है, शास्त्र-सिद्धांत नहीं।
✔️ पर्व की तरह नहीं
✔️ फलित-ज्योतिष की तरह नहीं
✔️ बल्कि —
के रूप में।
संक्रांति न तो अंधविश्वास है, न कर्मकांड।
यह:
का समन्वय है।
मकर संक्रांति मकर के कारण नहीं है,
बल्कि संक्रांति के कारण है।
राशि नाम है, सत्य सूर्य की गति है।
क्योंकि सनातन परंपरा को:
बल्कि केवल विवेकपूर्ण वैदिक दृष्टि से।
-आचार्य दीपक







