संक्रांति : वैदिक, खगोलीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

1. भूमिका : संक्रांति – पर्व नहीं, एक सिद्धांत

भारतीय समाज में “संक्रांति” शब्द को प्रायः एक धार्मिक पर्व या फलित-ज्योतिषीय घटना के रूप में समझ लिया गया है। विशेष रूप से मकर संक्रांति को लेकर यह धारणा बना दी गई है कि सूर्य किसी “मकर नामक राशि” में प्रवेश करता है और उसी कारण यह दिन पवित्र या शुभ हो जाता है।

यह लेख आचार्य दीपक द्वारा इसी मूलभूत भ्रांति को तथ्य, शास्त्र और विज्ञान के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास है।

संक्रांति न तो पूजा का विषय है, न ही कोई अलौकिक घटना। यह काल-गति (Time Dynamics) और सूर्य की दिशात्मक गति से संबंधित एक वैज्ञानिक-सिद्धांत है, जिसे वैदिक ऋषियों ने अत्यंत सूक्ष्मता से समझा था।


Table of Contents


2. संक्रांति शब्द का शुद्ध अर्थ

संक्रांति = सम् + क्रान्ति
अर्थात — एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाना

वैदिक परंपरा में संक्रांति का अर्थ है:

सूर्य की गति में होने वाला दिशात्मक परिवर्तन।

यह परिवर्तन:

  • न तिथि है
  • न पर्व
  • न देव-पूजा

बल्कि यह प्राकृतिक खगोलीय घटना है।

📅 विक्रम संवत Calendar में यह कब आती है?

विवरणतिथि
ग्रेगोरियन कैलेंडर21–22 दिसंबर
विक्रम संवत (लगभग)पौष कृष्ण / शुक्ल पक्ष
नक्षत्रीय स्थितिसूर्य की दक्षिणतम स्थिति
वैदिक नामउत्तरायण आरंभ

📌 यहाँ कोई निश्चित “तिथि संख्या” नहीं दी जा सकती,
क्योंकि विक्रम संवत लूनी-सोलर (चंद्र-सौर) है।

👉 घटना सूर्य पर आधारित है,
जबकि तिथि चंद्रमा पर आधारित

फिर विक्रम संवत पंचांग में “मकर संक्रांति” क्यों 14 जनवरी को?

अब दूसरा स्तर समझिए।

🔹 पंचांगीय मकर संक्रांति

  • सूर्य का निरयन मकर खंड में प्रवेश
  • यह राशि-आधारित गणना है
  • वेदांग ज्योतिष की मूल अवधारणा नहीं

📅 विक्रम संवत में यह आती है:

  • पौष मास में
  • प्रायः पौष शुक्ल पक्ष में
  • ग्रेगोरियन अनुसार: 13–15 जनवरी

📌 इसलिए पंचांग लिखता है:

“मकर संक्रांति — पौष मास, शुक्ल पक्ष”

लेकिन यह लेबलिंग है, घटना नहीं


3. क्या वेदों में संक्रांति या मकर संक्रांति का उल्लेख है?

यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक है।

3.1 वेदों में क्या नहीं है

  • ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद — किसी में भी 12 राशियों का वर्णन नहीं है।
  • “मेष, वृष, मिथुन… मकर” जैसे नाम वेदकालीन नहीं हैं

3.2 वेदों में क्या है

वेदों में बार-बार उल्लेख मिलता है:

  • सूर्य की गति
  • ऋतु परिवर्तन
  • अयन (उत्तरायण–दक्षिणायण)
  • काल-चक्र

अर्थात — वेदों का फोकस राशि नहीं, गति (Motion) है।


4. वेदांग ज्योतिष : संक्रांति का वास्तविक आधार

वेदांग ज्योतिष का उद्देश्य स्पष्ट है:

यज्ञ, ऋतु, काल और खगोलीय घटनाओं का शुद्ध निर्धारण।

वेदांग ज्योतिष में:

  • सूर्य की उत्तर–दक्षिण गति
  • अयन परिवर्तन
  • नक्षत्र आधारित गणना

मिलती है, राशि आधारित नहीं

यहाँ संक्रांति का अर्थ है:

जब सूर्य की गति दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर परिवर्तित होती है।


5. राशि प्रणाली : वैदिक सत्य या गणनात्मक सुविधा?

यह प्रश्न अत्यंत आवश्यक है।

5.1 राशि प्रणाली का स्वरूप

12 राशियाँ वस्तुतः:

  • सूर्य-पथ (Ecliptic) को
  • 12 समान भागों में
  • विभाजित करने की गणितीय सुविधा हैं।

जैसे:

  • Latitude–Longitude
  • Time Zones

वैसे ही राशियाँ।

फिर “मकर राशि” की संकल्पना आई कहाँ से?

यह बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है।

ऐतिहासिक तथ्य

  • 12 राशियों का विभाजन गणनात्मक सुविधा (Mathematical Segmentation) के लिए किया गया
  • यह प्रणाली:
    • बेबीलोन
    • यूनानी
    • बाद में भारतीय फलित ज्योतिष
      में विकसित हुई

👉 यह एक Coordinate System है, न कि कोई दैवी या प्राकृतिक सत्ता।

5.2 समस्या कहाँ हुई?

जब:

  • गणनात्मक संकेत (Marker)
  • को वास्तविक कारण (Cause)

समझ लिया गया।

यहीं से फलित-ज्योतिष ने यह कहना शुरू किया:

“सूर्य मकर में है इसलिए शुभ है।”

जबकि वैदिक दृष्टि में सूर्य की दिशा शुभ या अशुभ नहीं होती, केवल अनुकूल या प्रतिकूल होती है।


6. मकर संक्रांति : नाम बनाम घटना

अब मूल प्रश्न:

“यदि राशि वैदिक नहीं है, तो मकर संक्रांति क्यों?”

उत्तर स्पष्ट है:

  • मकर कोई कारण नहीं
  • संक्रांति ही वास्तविक घटना है

“मकर” केवल एक नामकरण (Label) है, जिससे समाज उस खगोलीय बिंदु को पहचान सके जहाँ:

  • सूर्य की उत्तरगामी गति प्रारंभ होती है।

7. उत्तरायण : खगोलीय और वैज्ञानिक व्याख्या

7.1 पृथ्वी और सूर्य का संबंध

  • पृथ्वी की धुरी लगभग 23.5° झुकी हुई है
  • इस कारण सूर्य का apparent path बदलता है

7.2 शीत अयनांत के बाद

  • सूर्य की declination न्यूनतम होती है
  • इसके बाद सूर्य उत्तर दिशा की ओर प्रतीत होता है

यही उत्तरायण है।

यह कोई धार्मिक कल्पना नहीं, बल्कि खगोलीय तथ्य है।


8. उत्तरायण और जैविक विज्ञान

आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि:

  • सूर्य-प्रकाश (Photoperiod)
  • मानव हार्मोनल सिस्टम
  • चेतना और ऊर्जा स्तर

पर प्रभाव डालता है।

उत्तरायण के बाद:

  • दिन बड़े होते हैं
  • प्रकाश बढ़ता है
  • जैविक सक्रियता बढ़ती है

इसीलिए भारतीय परंपरा में यह कृषि और ऊर्जा-चक्र से जुड़ा है।


9. भीष्म पितामह और उत्तरायण की प्रतीक्षा : सही व्याख्या

महाभारत का यह प्रसंग सबसे अधिक गलत समझा गया है।

9.1 लोकप्रिय भ्रांति

“उत्तरायण में मरने से मोक्ष मिलता है।”

यह कथन:

  • न वेदों में है
  • न उपनिषदों में
  • न गीता में

9.2 वास्तविक अर्थ

भीष्म पितामह:

  • इच्छा-मृत्यु वाले योगी थे
  • वे दिन नहीं, क्षण चुन रहे थे

उत्तरायण उनके लिए:

  • शुभ तिथि नहीं
  • बल्कि चेतना के उर्ध्वगमन के अनुकूल काल था

काल कारण नहीं, सहायक परिस्थिति था। जब प्रकृति में ऊर्ध्वगामी प्रवाह हो,
तब साधक के लिए चेतना को ऊपर ले जाना सहज होता है।


10. देवयान–पितृयान : प्रतीकात्मक अर्थ

उपनिषदों में वर्णित:

  • देवयान
  • पितृयान

को यदि literal (शाब्दिक) न लेकर:

  • चेतना की दिशा
  • और जीवन-दृष्टि

के रूप में समझा जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि:

मोक्ष का कारण काल नहीं, चित्त की अवस्था है।


11. उत्तरायण = मोक्ष मिथक का तार्किक खंडन

यदि उत्तरायण में मरना ही मोक्ष देता, तो:

  • युद्ध में मरे लाखों लोग मुक्त हो जाते
  • दुर्घटना और अज्ञान का कोई अर्थ न रहता

लेकिन ऐसा नहीं है।

अतः यह धारणा लोक-मान्यता है, शास्त्र-सिद्धांत नहीं।


12. संक्रांति को कैसे समझा जाए?

✔️ पर्व की तरह नहीं
✔️ फलित-ज्योतिष की तरह नहीं
✔️ बल्कि —

  • खगोलीय घटना
  • काल-चक्र का बिंदु
  • प्रकृति की दिशात्मक ऊर्जा

के रूप में।


13. निष्कर्ष : संक्रांति का सही बोध

संक्रांति न तो अंधविश्वास है, न कर्मकांड।

यह:

  • वैदिक कालबोध
  • वैज्ञानिक खगोल
  • और जीवन-ऊर्जा

का समन्वय है।

अंतिम सार-वाक्य:

मकर संक्रांति मकर के कारण नहीं है,
बल्कि संक्रांति के कारण है।
राशि नाम है, सत्य सूर्य की गति है।


✦ यह लेख क्यों आवश्यक है?

क्योंकि सनातन परंपरा को:

  • न अंधभक्ति से बचाया जा सकता है
  • न आधुनिक नकार से

बल्कि केवल विवेकपूर्ण वैदिक दृष्टि से।

-आचार्य दीपक

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