
भारतीय वैदिक परंपरा के अनेक विषय ऐसे हैं जिन्हें आज के समय में आधे ज्ञान और आधुनिक नैतिक दृष्टि से देखकर गलत समझ लिया गया है। नियोग क्रिया उनमें से एक है।
आज—
जबकि वास्तविकता यह है कि—
नियोग भारतीय वैदिक समाज की एक अत्यंत गंभीर, नियंत्रित और धर्मसम्मत सामाजिक व्यवस्था थी।
यह न तो—
बल्कि इसका उद्देश्य केवल और केवल—
👉 वंश की रक्षा
👉 धर्म की निरंतरता
👉 सामाजिक संतुलन
था।
नियोग = नि + योग
👉 अर्थात्
विशेष नियमों और सामाजिक अनुशासन के अंतर्गत की गई सीमित नियुक्ति।
नियोग का अर्थ कभी भी—
नहीं रहा।
आज संतान को व्यक्तिगत इच्छा माना जाता है,
पर वैदिक समाज में संतान—
ऋग्वेद (10.85) में विवाह का उद्देश्य स्पष्ट है—
प्रजायै — संतान के लिए
यदि किसी कारणवश संतान न हो—
तो वह केवल निजी दुःख नहीं,
बल्कि धार्मिक और सामाजिक संकट माना जाता था।
नियोग कोई सामान्य प्रथा नहीं थी।
यह आपद्धर्म (आपातकालीन व्यवस्था) के अंतर्गत आती थी।
प्रश्न उठता है—
❓ क्या एक स्त्री को जीवनभर संतानहीन और असुरक्षित छोड़ देना धर्म है?
❓ क्या वंश और राज्य का नाश होने देना धर्मसम्मत है?
➡️ वैदिक समाज का उत्तर था — नहीं।
यह अत्यंत आवश्यक है कि हम समझें—
नियोग विवाह का विकल्प नहीं था।
नियोग केवल—
👉 संतानोत्पत्ति तक सीमित सामाजिक दायित्व
था।
वेद विधि-ग्रंथ नहीं हैं,
पर सामाजिक दर्शन अवश्य देते हैं।
ऋग्वेद और ब्राह्मण ग्रंथों में—
बताया गया है।
इसी दृष्टि से नियोग जैसी व्यवस्था विकसित हुई।
नियोग का सबसे सशक्त प्रमाण महाभारत है।
तब—
फलस्वरूप—
का जन्म हुआ।
दासी से उत्पन्न विदुर भी इसी व्यवस्था का परिणाम हैं।
❗ क्या वेदव्यास जैसे महर्षि
❗ क्या महाभारत जैसा धर्मग्रंथ
❗ अधर्म को स्थापित कर सकता है?
➡️ नहीं।
यह प्रश्न सबसे अधिक विवादित है।
शास्त्रीय नियोग में प्रत्यक्ष संभोग होता था।
परंतु—
था।
यह केवल—
👉 गर्भधारण हेतु साधन
था।
नियोग में—
था।
यह उतना ही यांत्रिक और सीमित था
जितना आज IVF या चिकित्सा प्रक्रिया।
नियोग अत्यंत कठोर नियमों से बंधा था—
जैसे ही गर्भ ठहरता—
यह नियोग की नैतिकता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
👉 संतान मृत या अक्षम पति की ही मानी जाती थी।
इससे स्पष्ट है—
नियोग व्यक्तिगत लाभ नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व था।
| नियोग | व्यभिचार |
|---|---|
| शास्त्रसम्मत | शास्त्रविरुद्ध |
| समाज द्वारा स्वीकृत | समाज द्वारा निंदित |
| नियमबद्ध | अनियंत्रित |
| कामरहित | कामप्रधान |
| धर्म उद्देश्य | व्यक्तिगत सुख |
नियोग को व्यभिचार कहना
शास्त्रों की अज्ञानता है।
अक्सर कहा जाता है—
“नियोग स्त्री-शोषण था।”
वास्तविकता—
नियोग ने स्त्री को—
धर्म समयानुसार स्वयं को सीमित करता है।
जैसे-जैसे—
धर्मशास्त्रों ने—
👉 नियोग को निषिद्ध कर दिया।
आज—
नियोग केवल—
👉 ऐतिहासिक और शास्त्रीय अध्ययन का विषय है।
आज समाज स्वीकार करता है—
प्रश्न—
क्या ये नैतिक हैं?
यदि हाँ—
तो नियोग को अनैतिक कहना तर्कसंगत नहीं।
अंतर केवल इतना है—
नियोग—
यह—
👉 एक सीमित
👉 अनुशासित
👉 धर्मसम्मत
सामाजिक व्यवस्था थी।
शास्त्रों को
आज की दृष्टि से नहीं,
उनके काल, संदर्भ और उद्देश्य से समझना चाहिए।







राजेश कुमार
समाज और राष्ट्र की संतुलन के लिए नियोग अच्छी प्रक्रिया थी