मनुष्य की उत्पत्ति का प्रश्न केवल आधुनिक विज्ञान का नहीं है। यह प्रश्न वेदों, उपनिषदों और भारतीय दर्शनों में अत्यंत गंभीरता से उठाया गया है। आज प्रचलित विकासवाद (Evolution Theory)
मनुष्य की उत्पत्ति का प्रश्न केवल आधुनिक विज्ञान का नहीं है। यह प्रश्न वेदों, उपनिषदों और भारतीय दर्शनों में अत्यंत गंभीरता से उठाया गया है। आज प्रचलित विकासवाद (Evolution Theory)
भारतीय वैदिक परंपरा के अनेक विषय ऐसे हैं जिन्हें आज के समय में आधे ज्ञान और आधुनिक नैतिक दृष्टि से देखकर गलत समझ लिया गया है। नियोग क्रिया उनमें से
ग्रहण (Eclipse) शब्द सुनते ही रहस्य, उत्सुकता और अनेक मान्यताएँ हमारे मन में उमड़ने लगती हैं। भारतीय परंपरा में ग्रहण को केवल खगोलीय घटना ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक
संतान उत्पत्ति केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह धर्म, समाज और भविष्य की आधारशिला है। वैदिक शास्त्र कहते हैं कि संतान का जन्म संस्कार और धर्म परंपरा को
मनुष्य कर्मशील है। कर्म करते हुए वह या तो धर्मपथ पर चलता है या अधर्म की ओर भटक जाता है। जब अधर्मजन्य कर्म होता है तो उसे शास्त्रों में पाप
भारतीय समाज में “शूद्र” शब्द को लेकर सबसे अधिक भ्रांतियाँ फैली हुई हैं। आम जनमानस में यह धारणा बना दी गई है कि शूद्र का अर्थ “नीच जाति” या “दास”
भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में “देवता” शब्द का अत्यंत गहरा और वैज्ञानिक महत्व है। प्रायः लोगों के मन में यह प्रश्न आता है कि “क्या वास्तव में सनातन धर्म
मानव जीवन कर्मप्रधान है। प्रत्येक क्षण हम कर्म करते हैं—चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो या वाचिक। वेद, उपनिषद, गीता, मनुस्मृति और समस्त धर्मशास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि
वर्तमान हिन्दू समाज की सबसे लोकप्रिय धारणा में ब्रह्मा, विष्णु और शिव को सृष्टि के तीन अलग-अलग देवता माना जाता है — ब्रह्मा को सृष्टिकर्ता, विष्णु को पालनकर्ता और शिव
भारतवर्ष की राजनीति सदैव धर्म से पोषित रही है। ‘धर्म’ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन पद्धति और नीति का आधार है। जब राजनीति से धर्म अलग होता है, तब सत्ता







Dr. Jhumsor Rime: 1st time in life got this certain knowledge about Sanatani, it's philosophy n its way of life
Ishmohan naithani: Praise worthy
Rashmi: Acharya ji ne saral bhasha me vishya ka varnan kiya hai.Vyakti ke sarvanheen vikas guru ke saniddhy me rahne se hi sambhav hai.Gurukul aaj ki bhanti paisa kamane ka sadhan nahi the. Guru ka achran bhi anukarniy hota tha Aaj ki shiksha paddhati me aur prachin paddhati me antar spasht hai
Rashmi: Very nicely explained.