धर्म और विज्ञान का क्या संबंध है? क्या अधिक धार्मिक होने से व्यक्ति अधिक वैज्ञानिक बनता है?

क्या धर्म और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी हैं?
या फिर दोनों मनुष्य की एक ही मूल जिज्ञासा—“सत्य क्या है?”—को अलग-अलग क्षेत्रों में खोजने के दो मार्ग हैं?

आज धर्म को अक्सर आस्था, पूजा-पद्धति और परंपराओं तक सीमित करके देखा जाता है, जबकि विज्ञान को प्रयोगशाला, तकनीक और प्रमाण से जोड़कर देखा जाता है। इस कारण एक सामान्य धारणा बन गई है कि धर्म और विज्ञान दो विपरीत ध्रुव हैं।

लेकिन भारतीय दार्शनिक परंपरा को गहराई से देखें तो तस्वीर कहीं अधिक रोचक है।

भारतीय चिंतन में सत्य की खोज, प्रमाण, तर्क, आत्मनिरीक्षण, कारण-कार्य संबंध, प्रकृति के नियम और चेतना का अध्ययन लंबे समय से दार्शनिक चर्चा के विषय रहे हैं। न्याय दर्शन में तो ज्ञान के साधनों—जैसे प्रत्यक्ष और अनुमान—पर व्यवस्थित विचार मिलता है।

इसी संदर्भ में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है:

क्या वास्तव में हम जितने गहरे अर्थ में धार्मिक होते जाते हैं, उतने ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले भी हो सकते हैं?

इसका उत्तर है—हाँ, लेकिन एक महत्वपूर्ण शर्त के साथ।

यदि धर्म का अर्थ केवल धार्मिक पहचान या कर्मकांड नहीं, बल्कि सत्य की खोज, विवेक, स्वाध्याय, आत्म-अनुशासन और वास्तविकता को समझने का प्रयास है, तो धर्म और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच गहरा संबंध स्थापित किया जा सकता है।


धर्म और विज्ञान: सबसे पहले दोनों को समझना होगा

विज्ञान और धर्म की तुलना करने से पहले यह समझना आवश्यक है कि दोनों शब्दों का अर्थ क्या है।

विज्ञान क्या करता है?

विज्ञान मुख्यतः बाहरी और मापने योग्य जगत के बारे में व्यवस्थित ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया है।

सरल रूप में:

प्रश्न → अवलोकन → परिकल्पना → प्रयोग → डेटा → विश्लेषण → निष्कर्ष

विज्ञान किसी दावे को इसलिए स्वीकार नहीं करता कि कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति उसे कह रहा है। उसे प्रमाण, परीक्षण और पुनरावृत्ति की आवश्यकता होती है।

धर्म क्या है?

धर्म को केवल पूजा या संप्रदाय के अर्थ में देखना भारतीय संदर्भ में बहुत सीमित दृष्टिकोण है।

धर्म का व्यापक प्रश्न है:

  • जीवन को किस प्रकार जिया जाए?
  • सत्य क्या है?
  • कर्तव्य क्या है?
  • सही और गलत का आधार क्या है?
  • मनुष्य के दुःख का कारण क्या है?
  • मन और चेतना की प्रकृति क्या है?
  • व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन कैसे बने?
  • मनुष्य अपने जीवन को कैसे अनुशासित करे?

इसलिए धर्म का एक भाग बाहरी जगत के बजाय आंतरिक जगत की खोज करता है।

यहीं से विज्ञान और आध्यात्मिक साधना के बीच एक महत्वपूर्ण समानता दिखाई देती है।

विज्ञान पूछता है—“यह कैसे होता है?”

विज्ञान का मूल प्रश्न अक्सर होता है:

How?

उदाहरण के लिए:

  • वर्षा कैसे होती है?
  • शरीर में ऊर्जा कैसे बनती है?
  • मस्तिष्क कैसे काम करता है?
  • ग्रहों की गति कैसी है?
  • बीमारी कैसे विकसित होती है?
  • पदार्थ किस प्रकार व्यवहार करता है?

दूसरी ओर आध्यात्मिक दर्शन कई बार पूछता है:

मैं कौन हूँ?

चेतना क्या है?

दुःख क्यों उत्पन्न होता है?

मन को कैसे नियंत्रित किया जाए?

मनुष्य को कैसे जीना चाहिए?

इसलिए दोनों के प्रश्नों का क्षेत्र कई बार अलग होता है, लेकिन दोनों में एक साझा तत्व है:

अज्ञात को जानने की जिज्ञासा।

क्या धर्म का अर्थ केवल “मान लेना” है?

यहीं सबसे बड़ा अंतर पैदा होता है।

यदि धर्म का अर्थ है:

“किसी ने कह दिया, इसलिए बिना प्रश्न किए मान लो।”

तो यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से टकरा सकता है।

लेकिन यदि धर्म का अर्थ है:

“सत्य को जानने का प्रयास करो, तर्क करो, आत्मनिरीक्षण करो, अनुभव करो और अपने जीवन में उसके परिणामों को देखो।”

तो यह दृष्टिकोण वैज्ञानिक मानसिकता के कई गुणों के करीब आ जाता है।

भारतीय दर्शन में प्रमाण की चर्चा इसी कारण महत्वपूर्ण है। विभिन्न दार्शनिक परंपराओं ने ज्ञान के वैध साधनों पर अलग-अलग विचार विकसित किए। प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द आदि को विभिन्न स्कूलों ने अलग-अलग प्रकार से स्वीकार और परिभाषित किया।

विशेष रूप से न्याय दर्शन में तर्क और ज्ञानमीमांसा का बहुत व्यवस्थित विकास हुआ।

न्याय दर्शन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

भारतीय दर्शन की न्याय परंपरा को समझना इस विषय में विशेष रूप से उपयोगी है।

न्याय दर्शन में ज्ञान प्राप्त करने के साधनों पर व्यवस्थित विचार किया गया। इसके प्रमुख प्रमाणों में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द शामिल हैं।

उदाहरण के लिए:

आप दूर पहाड़ी पर धुआँ देखते हैं।

आपके मन में विचार आता है:

जहाँ धुआँ है, वहाँ आग होगी।

इस प्रकार:

धुआँ → अनुमान → आग

यह केवल धार्मिक विश्वास नहीं है। यह कारण और संकेत के आधार पर निष्कर्ष निकालने की प्रक्रिया है।

आज वैज्ञानिक पद्धति में भी observation और inference का महत्वपूर्ण स्थान है।

इसलिए यह कहना उचित होगा कि:

भारतीय दर्शन में तर्क और प्रमाण की परंपरा धर्म-विचार से पूरी तरह अलग नहीं थी।

“जितने धार्मिक, उतने वैज्ञानिक” — इसका वास्तविक अर्थ क्या है?

इस वाक्य को सीधे स्वीकार कर लेना सही नहीं होगा।

क्योंकि कोई व्यक्ति बहुत धार्मिक हो सकता है लेकिन फिर भी:

  • वैज्ञानिक तथ्यों को न माने,
  • प्रश्न पूछने से डरे,
  • अंधविश्वास में विश्वास करे,
  • हर घटना का कारण चमत्कार बताए,
  • प्रमाण के बिना दावे स्वीकार करे।

इसलिए केवल धार्मिकता की मात्रा वैज्ञानिक सोच की गारंटी नहीं है।

सही कथन अधिक सूक्ष्म होगा:

“जितना धर्म व्यक्ति को सत्य, विवेक, स्वाध्याय, आत्मनिरीक्षण और कारण-कार्य की समझ की ओर ले जाता है, उतनी ही उसकी वैज्ञानिक दृष्टि विकसित हो सकती है।”

धर्म का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र—मन का अध्ययन

आधुनिक विज्ञान ने मस्तिष्क और व्यवहार को समझने के लिए neuroscience, psychology और cognitive science जैसी शाखाएँ विकसित की हैं।

भारतीय योग और ध्यान परंपराएँ हजारों वर्षों से मन, ध्यान, विचार और मानसिक अनुशासन को साधना का विषय बनाती रही हैं।

यह कहना सही नहीं होगा कि प्राचीन योगियों ने आधुनिक neuroscience की पूरी खोज पहले ही कर ली थी। ऐसा दावा ऐतिहासिक और वैज्ञानिक रूप से सावधानी मांगता है।

लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि ध्यान और mindfulness जैसी practices आज वैज्ञानिक अनुसंधान का विषय हैं।

ध्यान और आधुनिक विज्ञान

Mindfulness और Dhyan पर पिछले दशकों में काफी वैज्ञानिक शोध हुआ है।

एक systematic review/meta-analysis में mindfulness-based interventions के संबंध में emotion regulation पर सकारात्मक प्रभाव पाए गए, हालांकि शोधकर्ताओं ने evidence की सीमाओं और अध्ययन-गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए सावधानी बरतने की आवश्यकता भी बताई।

एक अन्य meta-analysis में mindfulness-based strategies और emotion regulation के बीच छोटा लेकिन statistically significant प्रभाव पाया गया; साथ ही publication bias और heterogeneity जैसी methodological limitations भी बताई गईं।

इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है:

ध्यान को केवल धार्मिक अभ्यास मानकर छोड़ देना आवश्यक नहीं है।

उसके कुछ प्रभावों को वैज्ञानिक रूप से मापा जा सकता है।


ध्यान में वास्तव में होता क्या है?

मान लीजिए किसी व्यक्ति को किसी ने अपमानित किया।

सामान्य स्थिति:

अपमान → विचार → क्रोध → प्रतिक्रिया

लेकिन नियमित ध्यान और आत्मनिरीक्षण से व्यक्ति अपने अनुभव को अधिक सूक्ष्मता से देखना सीख सकता है:

घटना → विचार → भावना → शरीर की प्रतिक्रिया → प्रतिक्रिया की इच्छा → चुनाव

यहाँ एक महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है।

व्यक्ति और उसकी प्रतिक्रिया के बीच एक awareness gap पैदा हो सकता है।

यही self-regulation का आधार बन सकता है।

आधुनिक शोध में mindfulness को attention, emotion regulation और self-awareness से जोड़कर अध्ययन किया गया है।


यम और नियम: क्या ये मानसिक विज्ञान से जुड़े हो सकते हैं?

पतंजलि योग दर्शन में यम और नियम का विशेष स्थान है।

उदाहरण:

अहिंसा

अनावश्यक हिंसक व्यवहार से बचना।

सत्य

वास्तविकता को जानबूझकर विकृत न करना।

अस्तेय

जो अपना नहीं है उसे लेने की प्रवृत्ति से बचना।

अपरिग्रह

अनावश्यक संचय और आसक्ति को कम करना।

शौच

शारीरिक और मानसिक शुद्धता।

संतोष

अनावश्यक असंतोष को नियंत्रित करना।

स्वाध्याय

स्वयं और शास्त्रीय ज्ञान का अध्ययन।

तप

अनुशासन।

इन सिद्धांतों को सीधे आधुनिक psychology का वैज्ञानिक सिद्धांत घोषित करना उचित नहीं होगा।

लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि self-control, delayed gratification, emotional regulation, habit formation और self-awareness जैसे आधुनिक psychological concepts के साथ इनके कुछ व्यवहारिक संबंधों पर विचार किया जा सकता है।

धर्म व्यक्ति को अपने ही मन का “Observer” बनाता है

आधुनिक जीवन में एक बड़ी समस्या है:

हम अपने विचारों को ही अपना सत्य समझ लेते हैं।

उदाहरण:

“मुझे गुस्सा आ रहा है।”

और फिर:

“मैं गुस्से वाला व्यक्ति हूँ।”

इन दोनों में अंतर है।

पहला है:

मैं क्रोध को अनुभव कर रहा हूँ।

दूसरा है:

मैं स्वयं को क्रोध के साथ पहचान रहा हूँ।

ध्यान और स्वाध्याय व्यक्ति को इस अंतर को देखने का अवसर देते हैं।

यहीं से एक महत्वपूर्ण मानसिक क्षमता विकसित हो सकती है:

अपने विचारों को देखना।

यानी:

Thought → Observation → Evaluation → Choice

यह प्रक्रिया critical thinking और self-regulation के लिए उपयोगी हो सकती है।

धर्म और कारण-कार्य का सिद्धांत

भारतीय दर्शन में कर्म की चर्चा बहुत महत्वपूर्ण है।

साधारण रूप में इसे समझें:

कर्म → परिणाम

लेकिन इसे वैज्ञानिक भौतिक नियम की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

उदाहरण के लिए:

यदि आप लगातार क्रोध करते हैं:

क्रोध → कठोर व्यवहार → संबंधों में तनाव → संघर्ष → मानसिक अशांति

यह एक observable behavioral chain हो सकती है।

इसी प्रकार:

अनुशासन → बेहतर आदतें → बेहतर व्यवहार → बेहतर परिणाम

यहाँ कर्म का एक व्यवहारिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

लेकिन पुनर्जन्म या कर्मफल के metaphysical दावों को आधुनिक विज्ञान द्वारा स्थापित तथ्य कहना अलग बात है और उसके लिए अलग प्रकार के प्रमाण की आवश्यकता होगी।


विज्ञान भी कहता है—हर घटना का कारण खोजो

वैज्ञानिक दृष्टिकोण की एक बुनियादी आदत है:

“ऐसा क्यों हुआ?”

धार्मिक/दार्शनिक चिंतन में भी यही प्रश्न दिखाई देता है:

दुःख क्यों है?
इच्छा क्यों उत्पन्न होती है?
क्रोध क्यों आता है?
आसक्ति क्यों बनती है?
अज्ञान का परिणाम क्या है?

यदि व्यक्ति हर घटना के पीछे केवल “चमत्कार” मानने के बजाय कारण खोजने लगता है, तो उसका दृष्टिकोण अधिक विश्लेषणात्मक हो सकता है।

लेकिन यहाँ विज्ञान और धर्म के बीच सीमा समझना बहुत जरूरी है

यह विषय जितना सुंदर है, उतना ही संवेदनशील भी है।

हमें यह दावा नहीं करना चाहिए कि:

“वेदों में आधुनिक physics पहले से पूरी तरह मौजूद थी।”

या:

“प्राचीन ऋषियों ने quantum mechanics खोज ली थी।”

या:

“हर वैदिक मंत्र का आधुनिक scientific explanation पहले से सिद्ध है।”

ऐसे दावे अक्सर science और spirituality दोनों को नुकसान पहुँचाते हैं।

क्योंकि विज्ञान में किसी claim के लिए:

Evidence + Method + Reproducibility + Falsifiability

जैसी चीजें महत्वपूर्ण होती हैं।

किसी शास्त्रीय वाक्य का आधुनिक वैज्ञानिक शब्दों से मिलता-जुलता लगना अपने-आप वैज्ञानिक प्रमाण नहीं बन जाता

आस्था और विज्ञान का अंतर

आस्था व्यक्ति को किसी मूल्य या आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे सकती है।

विज्ञान किसी empirical claim की सत्यता को परीक्षण के माध्यम से जांचता है।

इसलिए दोनों की भूमिकाएँ हमेशा समान नहीं हैं।

उदाहरण:

“मुझे सत्य बोलना चाहिए।”

यह मुख्यतः नैतिक प्रश्न है।

लेकिन:

“सत्य बोलने की आदत से मानसिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?”

यह empirical research का प्रश्न बन सकता है।

यही अंतर समझना बहुत जरूरी है।

धर्म की गहराई बढ़ने पर अंधविश्वास क्यों कम हो सकता है?

यदि व्यक्ति वास्तव में स्वाध्याय करता है तो उसके सामने एक समस्या आती है:

“मैं जो मानता हूँ, वह वास्तव में सत्य है या केवल मेरी धारणा है?”

यह प्रश्न अत्यंत शक्तिशाली है।

क्योंकि यह व्यक्ति को अपनी beliefs का observer बनाता है।

तब वह पूछ सकता है:

  • इसका प्रमाण क्या है?
  • इसका स्रोत क्या है?
  • इसका अर्थ क्या है?
  • क्या मैंने इसे स्वयं समझा है?
  • क्या यह संदर्भ से बाहर तो नहीं है?
  • क्या मेरी व्याख्या सही है?
  • क्या इसका कोई वैकल्पिक explanation है?

यही विवेक है।

और यही वैज्ञानिक temperament का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

धर्म यदि प्रश्न पूछने से रोकता है तो समस्या है

एक स्वस्थ ज्ञान-परंपरा में प्रश्नों के लिए स्थान होना चाहिए।

भारतीय परंपरा में संवाद की परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।

शिष्य प्रश्न करता है।

गुरु उत्तर देता है।

फिर शिष्य पुनः प्रश्न करता है।

ज्ञान केवल information transfer नहीं है; वह समझ की प्रक्रिया है।

इस दृष्टि से:

प्रश्न पूछना धर्म-विरोधी नहीं है। सही प्रश्न स्वयं ज्ञान की शुरुआत है।

वैज्ञानिक व्यक्ति को भी विनम्र क्यों होना चाहिए?

विज्ञान हमें केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि अपनी सीमाओं को समझने की क्षमता भी देता है।

आज जो हम जानते हैं, वह संपूर्ण ब्रह्मांड का पूरा ज्ञान नहीं है।

इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण गुण है:

Intellectual humility

अर्थात्:

“मुझे नहीं पता।”

यह वाक्य ज्ञान का विरोधी नहीं है।

बल्कि कई बार वास्तविक ज्ञान की शुरुआत है।

भारतीय दर्शन में भी “ज्ञाता”, “ज्ञान” और “ज्ञेय” जैसे प्रश्नों पर गंभीर विचार हुआ है।

धर्म और विज्ञान के बीच सबसे सुंदर पुल: “जिज्ञासा”

दोनों के बीच सबसे मजबूत पुल शायद जिज्ञासा है।

एक बच्चा पूछता है:

आकाश नीला क्यों है?

विज्ञान उत्तर खोजता है।

वही बच्चा पूछता है: मैं कौन हूँ?

आध्यात्मिक दर्शन इस प्रश्न पर विचार करता है।

वह पूछता है: मुझे दुःख क्यों होता है?

दर्शन और psychology दोनों अलग-अलग frameworks में इसे समझने का प्रयास कर सकते हैं।

इसलिए प्रश्न समान रूप से महत्वपूर्ण है:

“सत्य क्या है?”

बाहरी प्रयोग और आंतरिक प्रयोग

विज्ञान मुख्यतः बाहरी जगत में प्रयोग करता है।

आध्यात्मिक साधना में व्यक्ति स्वयं को observation का विषय बनाता है।

इसे एक सरल तुलना से समझिए:

वैज्ञानिक दृष्टिकोणआध्यात्मिक साधना
बाहरी घटना का observationआंतरिक अवस्था का observation
hypothesisसाधना/अनुसंधान की दिशा
experimentअभ्यास
measurementअनुभव/व्यवहार में परिवर्तन
analysisमनन
conclusionबोध/समझ

लेकिन यह तुलना पूर्ण समानता नहीं है

आध्यात्मिक अनुभव subjective होते हैं और उनकी वैज्ञानिक validity स्थापित करने के लिए अलग-अलग objective methodologies की आवश्यकता पड़ती है।

क्या धर्म व्यक्ति को वैज्ञानिक बना सकता है?

धर्म अपने-आप नहीं।

लेकिन धर्म के कुछ मूल सिद्धांत व्यक्ति में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुकूल गुण विकसित कर सकते हैं:

1. सत्य की खोज

व्यक्ति अपने beliefs को examine करता है।

2. स्वाध्याय

व्यक्ति निरंतर सीखता है।

3. तर्क

वह कारण पूछता है।

4. आत्मनिरीक्षण

वह अपने biases देखता है।

5. अनुशासन

वह impulses को नियंत्रित करना सीखता है।

6. जिज्ञासा

वह प्रश्न पूछता है।

7. विनम्रता

वह स्वीकार करता है कि उसका ज्ञान सीमित है।

8. अनुभव

वह केवल theoretical knowledge के बजाय practice पर भी ध्यान देता है।

लेकिन “धार्मिकता” और “वैज्ञानिकता” को एक ही चीज न समझें

यह distinction बहुत महत्वपूर्ण है।

एक व्यक्ति:

वैज्ञानिक + धार्मिक हो सकता है।

दूसरा:

वैज्ञानिक + अधार्मिक हो सकता है।

तीसरा:

धार्मिक + गैर-वैज्ञानिक हो सकता है।

चौथा:

न धार्मिक + न वैज्ञानिक हो सकता है।

इसलिए कोई सरल equation नहीं है:

धार्मिकता ↑ = वैज्ञानिकता ↑

बल्कि अधिक उचित मॉडल है:

सत्यनिष्ठा + जिज्ञासा + विवेक + प्रमाण + आत्मनिरीक्षण → वैज्ञानिक दृष्टिकोण

और यदि धर्म इन गुणों को मजबूत करता है, तो वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ सहायक संबंध बना सकता है।

भारतीय दृष्टिकोण से “धर्म” और “विज्ञान” का संतुलन

एक परिपक्व दृष्टिकोण यह नहीं कहता:

“विज्ञान गलत है, धर्म ही सब कुछ है।”

और न ही यह कहता है:

“धर्म की हर बात अंधविश्वास है।”

बल्कि वह पूछता है:

कौन-सा दावा किस प्रकार के प्रमाण की मांग करता है?

यदि दावा भौतिक है:

→ empirical evidence चाहिए।

यदि दावा मनोवैज्ञानिक है:

→ psychological research उपयोगी है।

यदि दावा नैतिक है:

→ philosophical reasoning आवश्यक है।

यदि दावा आध्यात्मिक अनुभव का है:

→ phenomenology, philosophy और contemplative practice के स्तर पर उसका अध्ययन किया जा सकता है।

यह विवेकपूर्ण दृष्टिकोण है।

निष्कर्ष: क्या अधिक धार्मिक व्यक्ति अधिक वैज्ञानिक हो जाता है?

इस प्रश्न का उत्तर एक शब्द में “हाँ” या “नहीं” देना उचित नहीं होगा।

सही उत्तर है:

धर्म की मात्रा नहीं, धर्म की गुणवत्ता महत्वपूर्ण है।

यदि धर्म का अर्थ केवल:

कर्मकांड + पहचान + परंपरा

है, तो उससे वैज्ञानिक दृष्टिकोण स्वतः विकसित नहीं होता।

लेकिन यदि धर्म का अर्थ है:

सत्य की खोज + विवेक + स्वाध्याय + आत्मनिरीक्षण + अनुशासन + तर्क + अनुभव + नैतिक जीवन

तो वह व्यक्ति को अधिक जागरूक, प्रश्नशील और विवेकशील बना सकता है।

और यही गुण वैज्ञानिक दृष्टिकोण के भी महत्वपूर्ण आधार हैं।

इसलिए शायद इस पूरे विषय को एक वाक्य में इस प्रकार समझा जा सकता है:

“विज्ञान हमें प्रकृति के नियमों को समझना सिखाता है और अध्यात्म हमें अपने भीतर के नियमों को देखना सिखाता है; दोनों की श्रेष्ठता तब है जब उनका उद्देश्य सत्य की खोज हो, न कि केवल अपनी मान्यता को सिद्ध करना।”

और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात:

सच्चा धर्म व्यक्ति को अंधविश्वासी नहीं, विवेकशील बनाना चाहिए; और सच्चा विज्ञान व्यक्ति को अहंकारी नहीं, सत्य के प्रति विनम्र बनाना चाहिए।

Vedic gurukul

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