
भारतवर्ष की राजनीति सदैव धर्म से पोषित रही है। ‘धर्म’ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन पद्धति और नीति का आधार है। जब राजनीति से धर्म अलग होता है, तब सत्ता स्वार्थ और भ्रष्टाचार का माध्यम बन जाती है। आज के भारत में यह विषय पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है।
वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, चाणक्य नीति और मनुस्मृति में स्पष्ट कहा गया है कि शासक धर्म के अधीन रहे, तभी राज्य स्थिर, समृद्ध और न्यायपूर्ण बनता है।
आइए प्रमाणों के साथ इस विषय को समझते हैं।
धारणात धर्म इत्याहुः — अर्थात जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। वेदों के अनुसार धर्म का मूल उद्देश्य है — समस्त प्राणियों में न्याय, सदाचार, सत्य, अहिंसा और कर्तव्यों का पालन सुनिश्चित करना। श्रेष्ठ गुणों को धारण करना ही सृष्टि के समस्त मनुष्य जाति का परम धर्म है — कर्तव्य, नैतिकता, न्याय, सत्य और लोककल्याण। राजनीति के संचालन में भी इन्हीं सिद्धांतों की आवश्यकता होती है।
मनुस्मृति में कहा गया है —
धर्मो रक्षति रक्षितः।
(जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।)
नीति का अर्थ है — विवेकपूर्ण निर्णय, आचार संहिता और व्यवहार कौशल। धर्म के बिना नीति भी अपूर्ण है। नीति को धर्म से शक्ति और नैतिक बल मिलता है। यही कारण है कि चाणक्य ने अर्थशास्त्र में राजनीति को धर्म आधारित नीति से जोड़कर ही देखा।
‘राजनीति’ — ‘राजा’ + ‘नीति’। राजा का आचरण कैसा हो, प्रजा की व्यवस्था कैसी हो — यह सब नीति शास्त्र का विषय है। यदि राजा (अथवा आज का जनप्रतिनिधि) नीति के साथ धर्म का पालन नहीं करता तो वही सत्ता भ्रष्टाचार, अत्याचार और स्वार्थ की जड़ बन जाती है।
ऋग्वेद 10.191.2:
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।
— अर्थात सभी मिलकर एकसमान विचार करें, साथ चलें। राजनीति का यही आधार है — समन्वय और धर्म।
अथर्ववेद 12.1.45:
धर्मेण धर्ममायन्तु धर्मेण प्रथिवी स्थिता।
— संपूर्ण पृथ्वी धर्म पर स्थिर है। राजा (शासक) धर्म से विमुख होगा तो व्यवस्था धराशायी होगी।
महाभारत में युधिष्ठिर को धर्मराज कहा गया। क्योंकि उनका शासन धर्म और न्याय पर आधारित था।
भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को शांतिपर्व में बताया:
“राजा का कर्तव्य धर्म रक्षा है, अन्यथा प्रजा का नाश अवश्यंभावी है।”
दुर्योधन का उदाहरण सामने है — धर्मविहीन सत्ता ने महाभारत का विनाशकारी युद्ध खड़ा किया।
महाभारत काल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
यह दिखाता है कि जब सत्ता से धर्म हटता है तो विनाश निश्चित है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा —
“सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।” (गीता 2/38)
राजा का धर्म है — न्याय करना, नीति से चलना, स्वार्थ छोड़कर राष्ट्र के कल्याण के लिए कर्म करना।
रामराज्य का आधार ही धर्म था। श्रीराम ने राज्य त्याग कर भी धर्म का पालन किया।
वाल्मीकि रामायण में श्रीराम कहते हैं — राजा का स्वार्थ नहीं, राष्ट्र का धर्म सर्वोपरि। श्रीराम ने निजी जीवन के कष्ट सहकर भी लोक कल्याण को प्राथमिकता दी।
चाणक्य कहते हैं —
“राज्यस्य मूलं इंद्रिय जयः।”
— शासक पहले अपने स्वार्थ और इंद्रियों को जीते, तभी राज्य सुशासन पाएगा।
चाणक्य ने धर्म को प्रशासन का मेरुदंड माना। उनका अर्थशास्त्र केवल अर्थ नहीं सिखाता, बल्कि धर्म, न्याय और सदाचार से जुड़ी नीति सिखाता है।
“राजा धर्मेण शासयेत्।”
— राजा धर्म से शासन करे।“राजा धर्मेण शासनं कृत्वा प्रजाः स्वे पथे स्थापयेत्।” मनुस्मृति 7/35
👉 राजा को धर्मपूर्वक शासन कर प्रजा को सही मार्ग पर रखना चाहिए
मनु महाराज कहते हैं — यदि राजा धर्मविहीन शासन करेगा तो प्रजा में अराजकता फैलेगी।
भारत के स्वर्णिम काल में मौर्य, गुप्त, चोल, चालुक्य जैसे राजवंशों ने धर्म आधारित शासन दिया।
सम्राट अशोक ने धर्म विजय को राजनीति का माध्यम बनाया। सम्राट हर्षवर्धन ने धर्म और संस्कृति का संरक्षण किया।
जब-जब सत्ता से धर्म विलुप्त हुआ — मगध, काशी, कन्नौज जैसे साम्राज्य आपसी कलह और स्वार्थ के कारण नष्ट हुए।
स्वतंत्रता के बाद भारत में राजनीतिक नैतिकता का क्षय हुआ —
यह सब दर्शाता है कि यदि नैतिक मूल्यों को राजनीति से हटा दिया जाए तो समाज का पतन निश्चित है।
| बिंदु | धर्म आधारित राजनीति | धर्मविहीन राजनीति |
|---|---|---|
| उद्देश्य | लोककल्याण | स्वार्थ-सत्ता |
| नीति | न्याय, सत्य | जोड़-तोड़, झूठ |
| परिणाम | शांति, समृद्धि | भ्रष्टाचार, अराजकता |
| उदाहरण | रामराज्य | महाभारत का कुरुक्षेत्र |
भारत में गुरुकुल पद्धति में राजा और राजकुमारों को धर्म, नीति, युद्धकला, न्यायशास्त्र और प्रजा धर्म पढ़ाया जाता था। यही कारण था कि चंद्रगुप्त मौर्य जैसा शासक चाणक्य जैसे गुरु की छत्रछाया में जन्म दिया।
आज के नेताओं के पास गुरुकुल जैसी नीति शिक्षा कहाँ है? आज की राजनीति में गुरुकुल आधारित नैतिक शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।
1️⃣ धर्म और नैतिक शिक्षा को राजनीति पाठ्यक्रम में लाना होगा।
2️⃣ गुरुकुल पद्धति को पुनर्जीवित करना होगा।
3️⃣ राजनेताओं को शपथ केवल किताब पर नहीं, आचरण से निभानी होगी।
4️⃣ जनता को भी जागरूक होकर धर्म और नीति को प्राथमिकता देनी होगी।
5️⃣ प्रशासन में वैदिक और चाणक्य नीति जैसे ग्रंथों का अध्ययन लागू करना होगा।
धर्म राजनीति का शुद्धिकरण करता है। राजनीति धर्म से प्रेरित होकर ही लोकमंगल कर सकती है। जो सत्ता धर्म से विमुख होती है, वह जनता के शोषण का साधन बन जाती है।
👉 आज आवश्यक है कि हम राजनीति को फिर से धर्म से जोड़ें — न कि मजहबी कट्टरता से, बल्कि शाश्वत नीति, सदाचार और न्याय से।
जैसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता में कहा —
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।”
— अपने धर्म का पालन करना ही श्रेष्ठ है।
राजनीति भी जब तक ‘स्वधर्म’ से जुड़ी है — तब तक राष्ट्र सुरक्षित है। जब धर्मविहीन है — तब स्वार्थ और पतन निश्चित है।







